घर अब अनजाना सा लगने लगा है।
माँ के गुजर जाने के बाद, अब वह घर घर जैसा नहीं लगता।
ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी हो या सबसे गहरा दुख,
अब किसी से बाँटने का मन नहीं करता।
माँ के जाने के बाद जैसे भीतर की आवाज़ ही धीमी पड़ गई हो।
अब पिता और भाई से बातचीत भी कभी कभी एकतरफा सी लगती है।
शब्द होते हैं, पर वह अपनापन कहीं खो गया है।
घर जाता हूँ,
तो दो तीन दिनों बाद ही एक अजीब सी बेचैनी घेर लेती है।
शायद इसलिए कि अब वह घर अपना नहीं लगता,
या शायद इसलिए कि घर वही है,
बस माँ नहीं है।
ज़िंदगी में जो भी छोटी बड़ी सफलताएँ मिलीं,
उनमें सबसे बड़ा सपना यही था कि माँ खुश होगी।
कुछ मंज़िलें केवल इसलिए चाहीं,
क्योंकि उन्हें पाकर माँ की आँखों में गर्व देखना चाहता था।
पर अजीब बात है,
जब वह सब मिला जिसके लिए वर्षों मेहनत की,
तब माँ ही नहीं रही।
कभी कभी सोचता हूँ,
किस्मत किसी को सब कुछ नहीं देती।
और अगर देती भी है,
तो बदले में कुछ ऐसा ले लेती है जिसकी कमी कभी पूरी नहीं होती।
मुझे sine wave से हमेशा प्यार रहा है।
उसकी तरह ही लगती है यह ज़िंदगी।
ऊपर उठती हुई, फिर अचानक नीचे गिरती हुई।
खुशी और दुख के बीच लगातार झूलती हुई।
कभी कभी मन करता है
सब छोड़कर वापस लौट जाऊँ।
इस परदेस की भागती हुई, भारी जिंदगी से दूर।
पर फिर खुद से एक सवाल टकराता है।
वापस जाऊँ भी तो किसके लिए?
जिसके लिए लौटने का मन करता था,
वह माँ अब वहाँ है ही नहीं।